सक्सेस चाहिए तो कम्फर्ट जोन से बाहर आइये

चेंज इज द ओनली कोन्सटेंट यानि कि केवल परिवर्तन ही अपरिवर्तनशील है।

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एक कम्फर्ट लाइफ के लिए क्या जरूरी है। एक अच्छा घर, एक अच्छी नौकरी, मौसम के हिसाब से खाना-पीना और लोंग वीकेंड हॉलिडे। अब इससे बेहतर लाइफ और क्या हो सकती है। लेकिन अब जरा ये भी सोचिए कि अगर हमेशा ऐसे ही रहे तो क्या जिंदगी इससे बेहतर बन सकती है। जिंदगी में स्थितियों हमेशा हमारे फेवर में नहीं होती और जब ऐसा होता है तब क्या। कभी-कभी तो आराम के दिन अच्छे लगते हैं पर अगर हमेशा ही ऐसा रहे तो इससे बेकार जिंदगी नहीं है क्योंकि ऐसी जिंदगी में कोई विकास नहीं, आगे बढ़ने की संभावना नहीं और किसी तरह का कोई एडवेंचर नहीं होता।

इसमें भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इसी कम्फर्ट के आदि हो जाते हैं और फिर चीजें खराब होने पर भगवान को दोष देते हैं कि हमारे साथ ही ऐसा क्यों कर रहे हैं। भगवान को या किसी और को दोष देने से अच्छा है खुद को दोष दें कि हम अपने साथ क्या कर रहे हैं। अगर आप जिंदगी में बदलाव नहीं चाहते तो समझ लीजिए कि आप जिंदगी में तरक्की नहीं चाहते। क्योंकि बदलाव का नाम ही जिंदगी है। इस बदलाव को आप तभी अपना सकते हैं जब आप अपने कम्फर्ट जोन से बाहर आते हैं।

आपने सुना होगा कि चेंज इज द ओनली कोन्सटेंट यानि कि केवल परिवर्तन ही अपरिवर्तनशील है।

लोग दूसरों से तो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं लेकिन खुद के जीवन में बदलाव स्वीकार नहीं करते। ऐसा कर वो अपने जीवन में आने वाले मौकों को गंवा देते हैं। मौके गंवाने के बाद असफलता के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगता और ऐसा होता है सिर्फ इसलिए क्योंकि लोग अपने कम्फर्ट जोन से बाहर नहीं आते और खुद को तकलीफ नहीं देते।

कम्फर्ट जोन क्या है

अपने बने बनाये रास्तों पर चलना ही कहलाता है कम्फर्ट जोन। इस जोन में हम अपने आपको इतना ढाल लेते हैं कि फिर किसी और तरह जीने का रास्ता हमें सूझता ही नहीं है। यही कम्फर्ट जोनए सीमित सोच का एक छोटा सा दायरा है जिसे हमने अपने चारों और खींचा हुआ है।  हम इस दायरे से बाहर निकलकर सोचते ही नहीं या यूं कहें कि निकलना ही नहीं चाहते।

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कैसे बनता है कम्फर्ट जोन

बचपन में घर पर, स्कूल में, कॉलेज में ऑफिस में हर जगह कहा जाता है ये मत करो, वो मत करो, ये गलत है, लोग क्या कहेंगे, ये सही नहीं है और यही सिलसिला ताउम्र चलता रहता है। व्यक्ति वही करने लगता है जो उससे कहा जाता है। जहां उसे नकारात्मक प्रतिक्रियाओं का सामना नहीं करना पड़ता। उस एक्सेप्टेंस हर कहीं बहुत आसानी से हो जाये। उसके अंदर यह डर बचपन से ही बैठा दिया जाता है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो उसे अलग-थलग कर दिया जायेगा। धीरे-धीरे हम उस ढर्रे पर चलने लगते हैं जो बने बनाये होते हैं या हम बना लेते हैं।

क्यों जरूरी है कम्फर्ट जोन टूटना

जब तक कम्फर्ट जोन टूटेगा नहीं तब तक हमें पता नहीं चलेगा कि हममें कितनी काबिलियत है और साथ ही ये भी कभी पता नहीं चलेगा कि जिंदगी उससे भी बेहतर हो सकती है जो हम इस वक्त जी रहे हैं। याद रखिये सागर में मिलने के लिए नदी को टेढ़े-मेढ़े रास्तों से होकर गुजरना ही पड़ता है वरना सिर्फ सीधे चलते रहने से वो कभी भी अपनी मंजिल नहीं पा सकेगी। नदी हमें सिखाती है हर बाधा को पार करते हुए अपने लक्ष्य को पाना।

 कैसे तोड़ें कम्फर्ट जोन

कम्फर्ट जोन को तोड़ना थोड़ा मुश्किल जरूर है पर नामुमकिन नहीं। कम्फर्ट जोन से बाहर आने के लिए धीरे-धीरे शुरुआत करें। एकदम से अगर कम्फर्ट जोन से बाहर आने की कोशिश करेंगे। तो स्ट्रेस लेवल बहुत बढ़ जायेगा इसलिए छोटे-छोटे कदम बढ़ायें। हर काम को अलग तरह से करने की कोशिश करें। कोई भी निर्णय अगर लेना है तो उसे लेने में कम से कम समय लगायें। हम जितना ज्यादा समय देंगे उतना ज्यादा अपने कम्फर्ट के बारे में सोचकर निर्णय लेंगे। नई जगहों पर जायें। वहां के माहौल में ढलने की कोशिश करें।

अगर सही मायनों में कहा जाये तो किसी का कम्फर्ट जोन उस व्यक्ति की एक खास मानसिक अवस्था होती है। हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इसमें इतनी बुरी तरह से जकड़े हुए होते हैं कि जब हम इसके अंदर रहते हैं तो हमें किसी एक्साइटमेंट का गहरा अनुभव नहीं होता। पानी भी एक जगह पड़े रहने से सड़ने लगता है। इसलिए जब आप अपने कम्फर्ट जोन को तोड़कर उससे बाहर आते हैं तो आप के काम करने की क्षमता बढ़ जाती है। अगर जिंदगी में कभी कुछ अचानक से नया होता है तो उसके साथ आसानी से तालमेल बनाया जा सकता है। कम्फर्ट जोन से बाहर अकर अगर भविष्य में कुछ नया करने का सोचा जाये तो आसानी से किया जा सकता है। क्रियेटिविटी बढ़ती है। सबसे अहम बात हम जिंदगी काटते नहीं बल्कि जीते हैं।

हमेशा तैयार रहिये अपने कम्फर्ट जोन की जंजीरें तोड़ने के लिए, अपना पोटेंशियल जानने के लिए। इतना सब करने के लिए क्यों न कम्फर्ट जोन की तोड़-फोड़ आज ही से शुरू की जाये।

 

नेहा राजौरा

 

 

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