Amit Shah Foreign Trips:अजीब संयोग या सोची-समझी रणनीति? 2006 से अब तक एक भी विदेशी यात्रा क्यों नहीं की अमित शाह ने?

Amit Shah Foreign Trips
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Amit Shah Foreign Trips: भारत की राजनीति में एक ऐसी दिलचस्प पहेली है, जिसका जवाब आज तक किसी को साफ़-साफ़ नहीं मिला। पहेली है: देश के गृह मंत्री अमित शाह आख़िर 20 साल से विदेश क्यों नहीं गए? यह सवाल इसलिए और बड़ा हो जाता है क्योंकि दुनिया भर के गृह मंत्री अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मिलते हैं, समझौते होते हैं, सुरक्षा पर चर्चा होती है… लेकिन इन सबमें अमित शाह की एक भी मौजूदगी नहीं दिखती। जब प्रधानमंत्री मोदी ने रिकॉर्ड तोड़ विदेशी यात्राएँ कीं, तब शाह का लगातार भारत में ही बने रहना और किसी भी वैश्विक गृह मंत्रियों की मीटिंग में शामिल न होना कई तरह की अटकलों को जन्म देता है। क्या यह कोई निजी निर्णय है? कोई वैचारिक दृढ़ता? या फिर एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति, जो उनके आगे के सफ़र का हिस्सा है?

उनकी आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, वर्ष 2006 के बाद से अमित शाह ने न कोई औपचारिक विदेश दौरा किया है, न ही कभी निजी यात्रा पर भारत की सीमाओं से बाहर कदम रखा है। दिलचस्प बात यह है कि वेबसाइट यह भी नहीं बताती कि 2006 से पहले उन्होंने किन-किन देशों की यात्रा की थी।

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वैचारिक प्रतिबद्धता या राजनीतिक रणनीति? (Amit Shah Foreign Trips)

बीजेपी के भीतर और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि शाह की यह शैली किसी अनिच्छा या संयोग का परिणाम नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी वैचारिक रणनीति का हिस्सा है। उनके करीबी इसे “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रतिबद्धता” से जोड़कर देखते हैं। वे मानते हैं कि शाह खुद को उस नेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं जिसकी ऊर्जा, विचार और राजनीतिक भविष्य पूरी तरह इस मिट्टी से निकलता है बिना किसी विदेशी प्रभाव के।

 

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यह भी कहा जाता है कि अंग्रेज़ी बोलने वाले भारतीय अभिजात वर्ग से उनकी दूरी भी इसी वैचारिक ढांचे का हिस्सा है। अपनी मातृभाषा गुजराती होने के बावजूद शाह हिंदी को राष्ट्रीय संवाद की सबसे उपयुक्त भाषा मानते हैं। बीजेपी के भीतर यह भी चर्चा रहती है कि संभव है शाह ने मन ही मन यह संकल्प लिया हो कि प्रधानमंत्री बनने तक वे किसी विदेश यात्रा पर नहीं जाएंगे। वह पीएम नरेंद्र मोदी के बाद एक संभावित उत्तराधिकारी माने जाते हैं, हालांकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी इस दौड़ का मज़बूत दावेदार माना जाता है।

मोदी की विदेश यात्राओं के बिल्कुल उलट राह

यह पूरा मामला इसलिए और दिलचस्प हो जाता है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 से अब तक 100 से ज्यादा विदेशी यात्राएं की हैं और भारत की वैश्विक भूमिका को हर मंच पर प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया है। ऐसे दौर में अमित शाह का देश की सीमाओं से बाहर न जाना एक अलग और स्पष्ट राजनीतिक संदेश देता है और यही संदेश भाजपा समर्थक वर्ग में उन्हें एक अलग पहचान देता है।

गृह मंत्री बनने के बाद भी रुख कायम

2019 में गृह मंत्री बनने के बाद भी शाह ने अपनी इस नीति में कोई बदलाव नहीं किया। जबकि उनके पूर्ववर्ती राजनाथ सिंह ने गृह मंत्री के रूप में कई विदेश यात्राएं की थीं चाहे वह सुरक्षा सहयोग बढ़ाना हो या अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक साझेदारियों को मज़बूत करना। मगर शाह इस परंपरा से अलग राह पर चले। गृह मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, वे अंतरराष्ट्रीय समन्वय व बातचीत को दिल्ली से ही संचालित करना पसंद करते हैं। जिन मामलों में विदेश संपर्क ज़रूरी होता है, वहां प्रतिनिधिमंडल भेजा जाता है या फिर वर्चुअल माध्यम का सहारा लिया जाता है।

क्यों गृह मंत्री आमतौर पर विदेश यात्रा कम करते हैं

हालांकि शाह की विदेश यात्राओं से दूरी राजनीतिक और वैचारिक रूप से भी देखी जाती है, लेकिन इसके कुछ व्यावहारिक और सरकारी कारण भी हैं:

1. गृह मंत्री की प्राथमिक भूमिका: आंतरिक सुरक्षा

गृह मंत्रालय देश में कानून-व्यवस्था, सीमा सुरक्षा, पुलिस बल, पैरामिलिट्री, इंटेलिजेंस समन्वय और आपदा प्रबंधन जैसी जिम्मेदारियां संभालता है। ऐसे में किसी भी आपात स्थिति के लिए गृह मंत्री का देश में मौजूद रहना बेहद ज़रूरी माना जाता है।

2. विदेश संबंध मुख्यतः पीएम और विदेश मंत्री का क्षेत्र

कूटनीतिक यात्राएं ज्यादातर प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री या रक्षा मंत्री करते हैं। गृह मंत्री का दायरा अपेक्षाकृत अधिक घरेलू होता है।

3. संवेदनशील स्थितियों में त्वरित हस्तक्षेप की जरूरत

दंगे, आतंकी घटनाएं, प्राकृतिक आपदाएं या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े किसी भी बड़े खतरे पर गृह मंत्री की तत्काल उपस्थिति अनिवार्य होती है।

4. ज़्यादातर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संवाद अधिकारी स्तर पर होते हैं

NSA, गृह सचिव और इंटेलिजेंस एजेंसियों के प्रमुख ही अधिकतर अंतरराष्ट्रीय बातचीत का नेतृत्व करते हैं। ऐसे में गृह मंत्री की विदेश यात्राओं की जरूरत कम पड़ती है।

इसके बावजूद, गृह मंत्री कभी-कभार विदेश दौरे करते हैं जैसे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सम्मेलन, काउंटर-टेररिज़्म समिट या क्षेत्रीय मंचों में भाग लेने के लिए, लेकिन यह बहुत कम होता है।

भारतीय सांस्कृतिक प्रतीकों की तरफ झुकाव

राजनीतिक रणनीतिकार कहते हैं कि शाह की जीवनशैली, भारतीय परंपराओं के प्रति उनका झुकाव और विदेश यात्राओं से दूरी इन सभी से उनके समर्थकों के बीच एक “पूरी तरह स्वदेशी नेता” की छवि बनती है। विशेषकर हिंदी पट्टी में उनकी यह छवि बीजेपी के कोर वोटबैंक को और मजबूत करती है।

क्या यह 20 साल लंबी यात्रा आगे भी जारी रहेगी?

2006 से 2025 तक न कोई औपचारिक विदेश यात्रा और न ही कोई निजी विदेश दौरा यह अपने आप में एक राजनीतिक कथा बन चुकी है। अमित शाह विदेश कब जाएंगे, यह अभी भी एक अनसुलझा सवाल है। लेकिन साफ है कि यह फैसला सिर्फ यात्रा का मामला नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक दर्शन और भविष्य की रणनीति का हिस्सा बन चुका है।

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