Prakash Yashwant Ambedkar: बाबासाहेब के पोते प्रकाश आंबेडकर की राजनीति और संघर्ष की कहानी, आंदोलन से संसद तक उनका सफर

Prakash Yashwant Ambedkar
Source: Google

Prakash Yashwant Ambedkar: भारत की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो हर दौर में अपना असर छोड़ते हैं। इनमें एक बड़ा नाम है प्रकाश यशवंत आंबेडकर, जिन्हें लोग ‘बालासाहेब आंबेडकर’ के नाम से भी जानते हैं। 10 मई 1954 को जन्मे प्रकाश आंबेडकर की पहचान सिर्फ डॉ. भीमराव आंबेडकर के पोते की नहीं है, बल्कि एक जिद्दी, बेबाक और जनहित के मुद्दों पर आंदोलनों को खड़ा करने वाले नेता की है।

और पढ़ें: दलाई लामा के गुरु Avalokiteshvara कौन हैं और तिब्बती बौद्ध धर्म में उनकी भूमिका क्या है? जानिए सब कुछ

परिवार और शुरुआती जीवन- Prakash Yashwant Ambedkar

प्रकाश आंबेडकर ऐसे परिवार में पले-बढ़े जहां सामाजिक न्याय और बराबरी सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा थे। उनके पिता यशवंत आंबेडकर और मां मीरा ने बच्चों को बौद्ध परंपरा और सामाजिक चेतना की सोच के साथ पाला। परिवार में दो भाई भीमराव और आनंदराज और एक बहन रमाबाई हैं, जिनकी शादी सामाजिक कार्यकर्ता आनंद तेलतुंबड़े से हुई है।

उनकी पत्नी अंजलि आंबेडकर एक गृहिणी हैं और एक बेटा सुजात आंबेडकर है, जो आज राजनीतिक गतिविधियों में पिता का साथ देता है। बचपन से ही विचारधारा का मजबूत माहौल प्रकाश के व्यक्तित्व में ऐसा घुला कि आगे चलकर वे राजनीति और समाज दोनों में सक्रिय भूमिका निभाने लगे।

राजनीति में कदम और ‘अकोला पैटर्न’ की पहचान

प्रकाश आंबेडकर ने 1990 के दशक में राजनीति में कदम रखा और जल्द ही अपनी अलग शैली की वजह से पहचाने जाने लगे। 1994 में उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी भारिप बहुजन महासंघ बनाई। कुछ ही समय बाद 1998 में वे अकुला से लोकसभा पहुंचे। भाजपा के पांडुरंग फुंडकर को हराने के बाद इस जीत ने उनके राजनीतिक सफर को नया मोड़ दिया।

1999 में वे दोबारा जीतकर संसद पहुंचे और इससे पहले वे राज्यसभा में भी सदस्य रह चुके थे। यानी वे उन नेताओं में हैं जिन्होंने भारतीय संसद के दोनों सदनों में अपनी बात रखी है।

लेकिन प्रकाश आंबेडकर का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रयोग “अकोला पैटर्न” माना गया, एक ऐसी रणनीति जिसमें दलित, मुस्लिम और वंचित समुदायों को एक साथ लाकर राजनीतिक शक्ति बनाने की कोशिश की गई। यह मॉडल आज भी महाराष्ट्र की राजनीति में चर्चा का विषय है।

आंदोलनों की पहचान और बेबाक आवाज

प्रकाश आंबेडकर सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक आंदोलनकारी चेहरा भी हैं। भीमा कोरेगांव हिंसा, रोहित वेमुला का मामला, ऊना में दलितों की पिटाई, अंबेडकर भवन विवाद हर जगह वे सबसे आगे दिखे। उनकी रैलियां अक्सर बड़ी भीड़ जुटाती हैं और उनका अंदाजा साफ है जो गलत लगे, उसके खिलाफ खड़े हो जाओ।

2017 में उन्होंने अपने बेटे सुजात के साथ बाबा साहेब द्वारा 1956 में शुरू किए गए अखबार प्रबुद्ध भारत को फिर से लॉन्च किया। 2016 में प्रेस तोड़े जाने के बाद यह अखबार बंद हो गया था, लेकिन प्रकाश ने इसे पुनर्जीवित कर, अपने दादा की बौद्धिक विरासत को आगे बढ़ाया।

वह अक्सर कहते हैं—“देश तभी बचेगा, जब संविधान बचेगा।”
उनकी राजनीति इस एक लाइन में पूरी तरह समझी जा सकती है।

विवाद भी रहे साथ-साथ

प्रकाश आंबेडकर की बेबाकी जहां कई लोगों को आकर्षित करती है, वहीं कई बार विवाद भी खड़े करती है। एक टीवी डिबेट के दौरान उन्होंने एंकर को लेकर दिए बयान पर काफी आलोचना झेलनी पड़ी। 2023 में उन्होंने औरंगज़ेब के ऐतिहासिक महत्व की बात कही और इसमें भी विवाद पैदा हो गया।

उनका कहना था, “इतिहास मिटाया नहीं जा सकता, वह 50 साल देश का शासक था।” इस बयान ने महाराष्ट्र में अलग ही बहस छेड़ दी।

संपत्ति और आज की स्थिति

आम धारणा के विपरीत, प्रकाश आंबेडकर करोड़ों के मालिक नहीं हैं। oneindia की रिपोर्ट के मुताबिक उनकी कुल संपत्ति करीब 46 लाख रुपये है और उन पर 12 लाख रुपये से ज्यादा की देनदारियां हैं। उनकी नेटवर्थ लगभग 33.55 लाख रुपये बताई जाती है।

राजनीति के मैदान में अब भी वही तेज आवाज

आज भी प्रकाश आंबेडकर महाराष्ट्र की राजनीति में एक मजबूत और अलग पहचान रखते हैं।
वंचित बहुजन आघाड़ी के प्रमुख होने के नाते वह दलित–मुस्लिम–ओबीसी और हाशिये पर खड़े लोगों के मुद्दों को जोर से उठाते हैं।

उनकी राजनीति सत्ता भले न दिला पाए, लेकिन दबे-कुचले लोगों को आवाज जरूर देती है और शायद यही कारण है कि 71 साल की उम्र में भी वह पहले की तरह ही सक्रिय और जोशीले दिखते हैं।

और पढ़ें: Who Was Li Dan Brahmin: बौद्ध धर्म को चीन तक पहुँचाने वाले भारतीय मूल के महान नेता की कहानी

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here