Sikhism in Siberia: साइबेरिया… जब इस नाम का ज़िक्र होता है तो सबसे पहले ज़हन में आती है बर्फ, दूर-दराज़ इलाके और ठंड से जमा देने वाली हवाएँ। लेकिन इसी बर्फीली ज़मीन पर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो सर्दी की इन परतों के बीच भी अपनी आस्था की गर्माहट को ज़िंदा रखे हुए हैं। बात हो रही है रूस में बसे सिख समुदाय की जो भले ही संख्या में बेहद छोटे हैं, लेकिन अपने संस्कार, परंपरा और पहचान को पूरी श्रद्धा से थामे हुए हैं।
रूस में सिख धर्म: कुछ सौ में सिमटी एक पहचान- Sikhism in Siberia
रूस में सिख धर्म एक अल्पसंख्यक धर्म है। पूरे देश में सिखों की संख्या मुश्किल से 300 से 1000 के बीच मानी जाती है। ज़्यादातर सिख मॉस्को में रहते हैं, और वहां का गुरुद्वारा नानक दरबार ही पूरे रूस में इकलौता गुरुद्वारा है। यही वजह है कि मॉस्को से सैकड़ों किलोमीटर दूर साइबेरिया जैसे इलाकों में रहने वाले सिखों के लिए सामुदायिक जीवन की कल्पना करना आसान नहीं।
हालांकि संख्या कम है, लेकिन इन सिखों की मौजूदगी और मेहनत रूस की ऊर्जा परियोजनाओं में साफ दिखाई देती है। भारत से आए इंजीनियर और तकनीशियन, साइबेरिया के तेल और गैस क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। दिन में मशीनों की आवाज़ के बीच और रात में गुरबाणी की गूंज के साथ, ये लोग अपनी आस्था और परंपरा को जी रहे हैं एकदम ख़ामोशी और संकल्प के साथ।
इतिहास की परतें: सिख पहुंचे थे रूस बहुत पहले
आपको बता दें, रूस में सिख धर्म की मौजूदगी कोई नई बात नहीं है। इसका इतिहास 16वीं सदी तक जाता है। यूएसएसआर की पुरानी खुदाइयों में 1951 में रूस के ओर्स्क (Orsk) नामक शहर से एक तांबे का बर्तन मिला, जिस पर गुरमुखी लिपि में लिखा एक शिलालेख था। ये बर्तन एक सिख व्यापारी भोलू सिंहा पड़त (Padat) से जुड़ा बताया गया, जो गुरु नानक देव जी के समकालीन माने जाते हैं।
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार, भोलू सिंहा एक व्यापारी थे जो मूल रूप से मुल्तान से थे और बाद में साइबेरिया पहुंचे। वहां उन्होंने व्यापार तो किया ही, साथ ही सिख विचारधारा का भी प्रचार किया। कुछ दस्तावेज़ बताते हैं कि गुरु नानक देव जी और भाई मर्दाना जी की तीसरी उदासी के दौरान उनका ओर्स्क आना हुआ था, जहाँ भोलू सिंहा ने उनका स्वागत किया था।
यह घटना इस बात का प्रमाण बन गई कि सिख धर्म की पहुंच सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि मध्य एशिया और रूस तक भी फैली।
सोवियत दौर में नई लहर
इतना ही नहीं अब आगे सुनिए, 1950 के दशक में, जब भारत और सोवियत संघ के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम शुरू हुए, तब कई सिख छात्र पढ़ाई के लिए रूस गए। कुछ सिख, जो उस समय साम्यवाद से प्रभावित थे, स्थायी रूप से वहीं बस गए। इन लोगों ने खासकर रेडियो और भारतीय भाषाओं की पत्रिकाओं में काम किया।
1991 में सोवियत संघ के टूटने के बाद ये कार्यक्रम बंद हो गए, लेकिन 1990 के अंत तक फिर से कुछ भारतीय छात्रों और कामगारों की आमद शुरू हुई। हालांकि 2020 तक भी, रूस में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों में सिखों की संख्या कुल का महज़ 2% ही थी।
मॉस्को का गुरुद्वारा: एक ‘सांस्कृतिक केंद्र’
मॉस्को में एक समय था जब सिख समुदाय सिर्फ किराए के हॉल में कीर्तन और लंगर करता था। फिर 1996 में ‘मॉस्को गुरुद्वारा कमेटी’ रजिस्टर्ड हुई और 2005 में गुरुद्वारा नानक दरबार की स्थापना हुई। दिलचस्प बात ये है कि इसे सरकारी रूप से ‘गुरुद्वारा’ का दर्जा नहीं मिला, बल्कि इसे एक “सांस्कृतिक केंद्र” के तौर पर मान्यता दी गई।
हर रविवार करीब 100 श्रद्धालु यहां आते हैं। लेकिन जब गुरुपर्व या विशेष धार्मिक दिन होता है, तो यह संख्या दोगुनी हो जाती है। ज़्यादातर श्रद्धालु अफ़ग़ान सिख शरणार्थी हैं, जिन्होंने रूस में शरण ली है और अब यहीं बस गए हैं।
ऊर्जा क्षेत्र ने बुलाया तो पहुंचे सिख प्रोफ़ेशनल
अब बात करें साइबेरिया की। हाल के वर्षों में भारत और रूस के बीच ऊर्जा सेक्टर में सहयोग बढ़ा है। रूसी कंपनियाँ साइबेरिया में तेल-गैस के विशाल भंडार को विकसित करने के लिए भारतीय साझेदारों को आमंत्रित कर रही हैं। उदाहरण के लिए, रूस की सबसे बड़ी तेल कंपनी रोज़नेफ्ट ने पूर्वी साइबेरिया के दो बड़े तेलक्षेत्रों में भारत की ऑयल ऐंड नैचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) को भागीदारी का प्रस्ताव दिया था। भारतीय तेल कंपनी ओएनजीसी विदेश ने तो 2008 में इम्पीरियल एनर्जी का अधिग्रहण करके तोम्स्क क्षेत्र के तेल कुओं में हिस्सेदारी भी ले ली थी, जिसके ज़रिए साइबेरिया के तेल भंडारों तक भारत की पहुंच बनी। इन सौदों के बाद कई भारतीय विशेषज्ञ, इंजीनियर और कर्मचारी साइबेरिया की ऊर्जा परियोजनाओं में काम करने आए।
साइबेरिया में तेल और गैस उद्योग में प्रवासी सिखों की उपस्थिति भले संख्या में छोटी हो, लेकिन उनका योगदान अहम है। स्थानीय रूसी कर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर ये भारतीय इंजीनियर कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में काम कर रहे हैं। भाषा की चुनौतियाँ भी हैं, कुछ ने रूस पहुंचकर बुनियादी रूसी शब्द सीख लिए हैं, जबकि प्रोजेक्ट स्थल पर अंग्रेज़ी तकनीकी भाषा से काम चल जाता है।
साइबेरिया के सिख: गुरुद्वारा दूर, लेकिन श्रद्धा पास
हालांकि, साइबेरिया में कोई औपचारिक गुरुद्वारा नहीं है। जो सिख यहाँ काम कर रहे हैं ज़्यादातर ऊर्जा परियोजनाओं में वो अपनी आस्था को खुद के ज़रिए ही ज़िंदा रखे हुए हैं।
इन लोगों के लिए कोई धर्मस्थल नहीं, कोई सामूहिक संगठन नहीं। लेकिन जहाँ दो-चार पंजाबी मिले, वहीं छोटे स्तर पर अरदास, पाठ, लंगर और गुरबाणी हो जाती है। शनिवार या रविवार को किसी के घर, ऑफिस कैंप या अपार्टमेंट में सब इकट्ठे होते हैं, कीर्तन सुनते हैं, एक साथ खाना पकाते हैं और घर जैसे माहौल में कुछ घंटे बिताते हैं।
इंटरनेट भी इनका बड़ा सहारा है। स्वर्ण मंदिर से होने वाला लाइव कीर्तन, या भारत में अपने परिवारों द्वारा वीडियो कॉल पर साझा किए गए गुरपुरब के दृश्य, इन्हें भावनात्मक रूप से जोड़े रखते हैं।
आस्था की तपिश, बर्फ में भी ज़िंदा
रोज़ाना 12-14 घंटे कड़ाके की ठंड में काम करने के बाद, ये लोग अपने छोटे कमरों में बैठकर गुरबाणी का पाठ करते हैं। कोई तख़्त नहीं, न चौर साहिब, न संगत, लेकिन फिर भी विश्वास पूरा है। यह वही आस्था है जो पंजाब की मिट्टी से जन्मी, लेकिन अब साइबेरिया की बर्फ में भी अपनी जड़ें जमा चुकी है।
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